
रीता बधवार (1) ( समय प्रतियोगिता | युगान्तकारी रचना हेतू प्रशंसा पत्र )
‘समय’है सर्व शक्तिमान, नहीं है विश्व में कोई इतना बलवान वक़्त है दिखाता सबको आईना, जिसमें झलकता रूप उसका शुद्ध सोना, वक़्त की ताक़त को

‘समय’है सर्व शक्तिमान, नहीं है विश्व में कोई इतना बलवान वक़्त है दिखाता सबको आईना, जिसमें झलकता रूप उसका शुद्ध सोना, वक़्त की ताक़त को

आज भी है कल भी होगा ‘समय’ है, वो प्रतिपल में होगा धरती क्या आकाश क्या वो तो जल और थल में भी होगा ना

आज फिर… सावन के वक़्त ने भादो से एसा मुँह फेरा कि पूरा ही घूम गया . घूमा ही नहीं एक जोर की छलांग भी

इस ब्रह्मांड में सब कुछ समय के घेरे में है .. सब कुछ समय के अधीन है ! सबसे महान है .. समय की सत्ता

सुधा जी! आज एक नए वृद्ध जोड़े का नामांकन हुआ है ,आप ही के शहर से हैं। ठीक है! तुम पुस्तिका में औपचारिकताएं पूर्ण करो,

रात सरकता शिशु रवि और, दिन में तपता भास्कर सांझ चमकते तारे हैं और रात रानी मेहताब है बस यहां समय का राज है मर्यादा

मैं आज से कल की स्मृतियाँ पिरो कर जोड़ता हूँ मैं समय हूँ ….मैं दिशायें मोड़ता हूँ चलता जाता हूँ अविरत , न रुकता हूँ

“समय”, तो गुज़रता है , गुज़रता ही चला जाएगा , अपनी ही रफ़्तार से, निरंतर यह बढ़ता जाएगा। “समय” की दहलीज पर ,ठहरा हुआ है

समय समय पर समय को सब अपना बना लेते है। अपना बताते हैं, अपना बताने से नहीं एतरातें हैं। सच में क्या समय अपना है!

आज पुकारे ये धरती माँ हे मानुष ! तू क्यों चुप खड़ा जल रही है जग जननी तू क्यूँ निज स्वार्थ पर अड़ा.. कभी पेड़ो
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