
डॉ. श्वेता प्रकाश कुकरेजा। (विधा : लघुकथा) (मेरा पहला प्यार | सम्मान पत्र)
आगरा जंक्शन से मैंने ट्रैन पकड़ी तो देखा सामने वाली सीट पर एक उम्रदराज दंपति बैठे थे।उनकी नोंकझोंक सुन बड़ा मज़ा आ रहा था। “सुंदर

आगरा जंक्शन से मैंने ट्रैन पकड़ी तो देखा सामने वाली सीट पर एक उम्रदराज दंपति बैठे थे।उनकी नोंकझोंक सुन बड़ा मज़ा आ रहा था। “सुंदर

पूरा स्टेडियम लोगों से भरा है।तेज लाईट और तालियों की गड़गडाहट गूंज रही है,पर मेरे हाथ पैर कांप रहे हैं ठण्डे से हो रहे हैं

वो पहला प्यार मुझको तो, बहुत ही याद आता है, सनम तुझसे नजाने क्यूँ, अजब सा एक नाता है ! ठिठुरती सर्द रातों में, कईं

आए मेरा पहला प्यार बन कर, खूबसूरत एहसास बन गए उमंग भरी हसीं सौग़ात बन कर, तुम बहुत ख़ास बन गए मोहब्बत का आग़ाज़ कर

उनसे नज़रें क्या मिली , जैसे प्यार की इजाज़त मिल गई , सुध-बुध खो बैठी , लगा, जन्नत मुझे मिल गई । पंख लग गए

मेरा पहला प्यार, जैसे छाई ,हर ओर बहार , एक दिन अचानक ही मिला,ख़त्म हुआ इंतज़ार । अनदेखा, अनजाना और धुँधला सा एक सपना ,

बारिश की बूँदों सा मीठा, प्यार था उसका सावन के झूलों सा,इठलाता अन्दाज़ था उसका ख़ूबसूरती से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत साथ था उसका पल दो

वक़्त के तराज़ू में भी जो हल्की नहीं पड़ती होती है वो पहले प्यार की कसक़ जो धुंधली नहीं पड़ती। स्व रचित #स्वातिगर्ग

अपने दिल के टुकड़े का पहला स्पर्श ताउम्र के लिए एक माँ का पहला प्यार बन कर रह जाता है ! निशा टंडन
Have you ever read a book that has you on the edge of your seat? Perhaps even chewing your nails? It seems like you cannot
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