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भावना शर्मा। (विधा : लघुकथा) (मेरा पहला प्यार | सम्मान पत्र)

पूरा स्टेडियम लोगों से भरा है।तेज लाईट और तालियों की गड़गडाहट गूंज रही है,पर मेरे हाथ पैर कांप रहे हैं ठण्डे से हो रहे हैं मानो मैं किसी गहरे गड्ढे में गिर रहा हूँ।मेरा हाथ मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने पकड़ रखा है,वो बराबर मुझे शान्त कर रहा है हौसला दे रहा है।पर आज बहुत घबरा रहा हूँ मैं।शरीर थोड़ा कमजोर है मेरा और थोड़ा दिमाग भी ,आम लोगों से बहुत अलग हूँ मैं।इसलिए मेरे अपने भी मेरे छोटे से काम को भी बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं।पर आज हजारों लोग मेरे लिए आए हैं तो सभी अपनों की आंखें नम है।मेरे अपने साए की तरह मेरे साथ रहते हैं।पर आज जैसा विशेष दिन मेरी जिंदगी में कभी आया नहीं है कि इतने लोग मेरे लिए आए मुझे देखें मुझे जानना चाहें।बहुत खुश हूँ मैं और बहुत घबराया हुआ भी।लड़खड़ाते कदमों के साथ मैं अपने दोस्त और मां के साथ मंच के बीच में आ गया हूँ।अब मेरी असली परीक्षा है जिसके लिए सभी यहां हैं।मेरे हाथ में रंग भरा ब्रश है और सामने खाली केनवास।ये रंग ,ब्रश और केनवास मुझे और ही दुनिया में ले जाते हैं।हर रंग नाचता है मेरे आगे ,इनकी और मेरी दुनिया ही अलग है।मैं इनके साथ ही खुद को महसूस कर पाता हूँ।मैं बस मैं हो जाता हूँ।इनके साथ मैं पूर्ण हो जाता हूँ।कोई अस्तित्व नहीं है मेरा इनके बिना।जिंदा होने का अहसास इन्हीं के साथ मिला है मुझे।हर उभरते रंग के साथ तालियों की गड़गड़ाहट बढ़ती जाती है और मैं डूब रहा हूँ इनकी खूबसूरती में इन रंगों की दुनिया में।सब कहते हैं मेरा पहला प्यार है ये और मुझे लगता है शायद आखिरी भी।

भावना शर्मा

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