
हिना खालिद”शाइस्ता”। (विधा : कविता) (मेरा पहला प्यार | प्रशंसा पत्र)
पहली मुहब्बत अगर सच्ची हो खिल उठते हैं हर ओर फूल हरश्रिंगार के महक उठती हैं सांसे पहले प्यार का अहसास होता सर्दी की गुनगुनी

पहली मुहब्बत अगर सच्ची हो खिल उठते हैं हर ओर फूल हरश्रिंगार के महक उठती हैं सांसे पहले प्यार का अहसास होता सर्दी की गुनगुनी

कभी -कभी पहला प्यार होता है एक छलावा और करामात तो देखो कि अल्हड़ मन को छला जाना भी अच्छा लगता हिना खालिद “शाइस्ता”

दिलबर की याद में लिखी थी जो मैंने दिल की हर बात ग़म और ख़ुशी में जब ज़ाहिर हुए थे दिल के कुछ जज़्बात हाँ

ऐशट्रे के मुहाने पर, बस एक कश लगी तिल तिल सुलगती सिगरेट सा हेडलाइन पर सरसरी नजर डाल बिखरे छोड़ दिए गए बासी होते अखबार

प्यार , मोहब्बत, इश्क़ , ये महज एक अल्फाज़ थे .. मगर जब तुमसे मिले तो जाना , पहले प्यार के क्या मायने थे ।

मेरा पहला प्यार दो लफ़्ज़ों में कैसे हो बयां मेरा पहला प्यार ©प्रीति पटवर्धन

आगरा जंक्शन से मैंने ट्रैन पकड़ी तो देखा सामने वाली सीट पर एक उम्रदराज दंपति बैठे थे।उनकी नोंकझोंक सुन बड़ा मज़ा आ रहा था। “सुंदर

पूरा स्टेडियम लोगों से भरा है।तेज लाईट और तालियों की गड़गडाहट गूंज रही है,पर मेरे हाथ पैर कांप रहे हैं ठण्डे से हो रहे हैं

वो पहला प्यार मुझको तो, बहुत ही याद आता है, सनम तुझसे नजाने क्यूँ, अजब सा एक नाता है ! ठिठुरती सर्द रातों में, कईं

आए मेरा पहला प्यार बन कर, खूबसूरत एहसास बन गए उमंग भरी हसीं सौग़ात बन कर, तुम बहुत ख़ास बन गए मोहब्बत का आग़ाज़ कर
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