
योगेश व्यास (अँधेरा प्रतियोगिता | सहभागिता प्रमाण पत्र )
कुछ छोड़ आया हूं, अंधेरो मै, बीती रातों और सवेरो मै उन तपती दोपहरों मै खाली रह बसेरों मै कुछ छोड़ आया हूं अंधेरो मै

कुछ छोड़ आया हूं, अंधेरो मै, बीती रातों और सवेरो मै उन तपती दोपहरों मै खाली रह बसेरों मै कुछ छोड़ आया हूं अंधेरो मै

उसकी दुनिया तो यूँ भी अंधेरी थी बचपन में ही आँखों की एक बड़ी बीमारी ने उसकी आँखें छीन ली थीं। ससुराल पहले से ही

मेरे प्रिय आत्मन , तमसो मा ज्योतिर्गमय ~ये प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा की गयी और दी गयी प्रार्थना है ! प्रार्थना का उच्चतम रूप

एक कोने में दुबकी हुई वह उन दोनों हैवानों को देख रही थी जो शराब की बोतले खाली किए जा रहे थे और वह तीन-चार

अंधेरे को मिटाने को एक चाँद तू भी जला ले बुझ गए चरागो में तू आज एक सूरज उगा ले अंधेरे के बोझ से क्यूँ

अंधेरा मिटता नहीं मिटाना पडता है बुझे चिरांग को फिर से जलाना पडता है दिया तले होता है अंधेरा पर हर रात के बाद होता

अंधेरा अंधेरा अंधेरा… सुनने में सिर्फ शब्द हैं अन्तर्मन की दहलीज को पार करके जज्बातों को झकझोर देता हैं इसके आगमन का क्रन्दन… वो निकली

अंधेरा जब पलता है, आंख जब छलता है, बेचैनी जब पलती है, रुह रूक रूक कर जब मचलती है। दिल दुआ करता है, दिमाग आंहे

स्याह काली रात, घनघोर अंधेरा साथ राह ना सूझे, बाट ना बुझे उम्मीद की कोई थाह ना फूटे अपना, पराया, माई – बाप जब कहीं

उलझनों का सफर चलता जा रहा है , “आरी “का असर बढ़ता जा रहा है , जब गम खुशियों पर भारी पड़ जाए उस समय
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