
नरेन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव (अँधेरा प्रतियोगिता | सहभागिता प्रमाण पत्र )
रात की काली अंधेरी फैलती चादर सो गया सूरज सुबह के बेचकर सपने दिन उधारी में मिला था पर विरासत रात की अपनी परछाईं से

रात की काली अंधेरी फैलती चादर सो गया सूरज सुबह के बेचकर सपने दिन उधारी में मिला था पर विरासत रात की अपनी परछाईं से

अरे कमला ये चोट कैसे लगी तुझे ? मेरा ये प्रश्न सुनकर कमला रोने लगी और रुंधे गले से बोली …..मालकिन कल फिर मुन्नी के

घबरा मत मन आज गर चहुं ओर दीख रहा अंधेरा ही अंधेरा है, हाथ को हाथ न सूझ रहा निराशा घर कर रही मन में,

मैं अंधेरा हूँ हाँ वही जिससे तुम बहुत डरते हो हर गुनाह का गुनाहगार भी मैं ही होता हूँ क्यूंकी मैं भयावह जो हूँ मेरे

दिलों में उम्मीद की एक शमा जलाए रखना अंधेरा हो तो हौसलों के चिराग़ जलाए रखना ये अँधेरी काली रात भी कभी आनी जरूरी है

अंधकार तब नहीं होता जब कहीं रौशनी न हो। अंधेरा तब होता है जब रौशनी तो हो पर उसे देखने की नजर न हो। अंधेरा

जब ज़िन्दगी मै तनहाई आती है .. ज़िन्दगी सूनी हो जाती है .. दिल जाने कंहा खो जाता है .. मन ही मन घबराता है

फिरता हु मै धरती पर फिर एक बार कटपुतली हू मै टूटी मेरी डोर बार बार ठिठूरती हड्डीया धुंधलाती नजर गलत सही गलत सही मूडती

यह अंधेरा काला स्याह इंतजार किसी के लिए, तो कहीं डर का आगाज कहीं सुबह के पहले की उदासी, तो कहीं सूने मकान में रोज

अंधेरा सघन, घनघोर, मन में उथल-पुथल, पुरज़ोर , बाहर शांत, भीतर शोर, जाने अब कब होगी भोर? हम अपने अंधकार से हारे हैं, फिर भी
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