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विनीता सावजी (अँधेरा प्रतियोगिता | सम्मान पत्र )

अंधेरा मिटता नहीं मिटाना पडता है
बुझे चिरांग को फिर से जलाना पडता है

दिया तले होता है अंधेरा
पर हर रात के बाद होता है सवेरा
अंधेरे में ही उजालो का अहसास होता है
जीवन में कष्ट से ही सुख का आभास होता है

कभी एक नशा सा होता है इन अंधेरो में
एक मासूमियत सी है इस शान्ति में
एक सुकून है इन ठंडी हवाओं में

एक अंधेरा दुसरे अंधेरे को भुला देता है
कभी दर्द ही दर्द की दवा देता है

वो चाँद अगर हमारा होता
जिंदगी मे ना कभी अंधेरा होता
खुश होता आज मै भी
दुःखो का ना कोई पहरा होता

हर तरफ अंधेरा छाया है
जाने कैसी ये माया है
हर घर की बेटियां डरी हुई है
मानो बाहर कोई शैतान आया है

डर को जितना अन्दर दबाओगे
जिंदगी मे उतना अंधेरा बढेगा
उस अंधेरे को उस रोशनी से मिला दो
तुम सब को जिदंगी जीना सीखा दो

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