आज ढूँढती हूं वो गुज़रे लम्हें तेरे मेरे,
लहरों के उस पार, सागर किनारे।
वो पीले फूलों की चादर पर साथ बैठना,
मेरे समय पर ना पहुंचने पर तुम्हारा रूठना।
मिन्नत खुशामद कर मेरा तुम्हें फिर मनाना,
और तुम्हारे गुस्से पर और प्यार आना ।
लहरों के शोर में दबी हमारी ख़ामोशी,
ठंडी हवाएं भी करतीं जब सरगोशी।
सबकी नज़रें बचाकर हमारा मिलना,
तब घंटों हमारा आंखों से बातें करना।
आंखें गुलाबी सपने देखती रहीं,
हम रेत के महल खड़े करते रहे।
हम थे वक्त से बेखबर , अंजान हकीकत से,
दुनिया तेरे मेरे बीच दीवार खड़ी करती रही।
जो लहरें कल तक शांत चल रही थीं,
सोचा नहीं, नागवार होगा उन्हें तेरा मेरा मिलन कभी।
तुम्हें संजो लेती, काश मैं सीप होती,
भर लेती अंक में, तुम बन जाते मोती।
कई काश अधूरे, हकीकत, सपनों से परे।
मिल जाती कोई तूलिका, रंग भर देती जीवन में।
आज काले बादल उमड़ते घुमड़ते रहे,
जैसे कह रहे हों, हां तूने बहुत दर्द सहे।
गवाह हैं वो मौन लहरें, फूल और बादल,
मेरी आंखों से बहती उन स्याह धाराओं के।
4 Comments on “सोनिया सेठी (कविता) (सागर किनारे प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र)”
Beautifully written and expressed ur feelings. I too felt swaying with ur thoughts. Well done Sonia and so very proud of you. Love you.
वाह … अप्रतिम😊
Very good, Bitiya Rani Ji.God Bless You.
Dil ko choo jate hai kavita ke har shabad