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निशा टंडन। (विधा : कविता) (हीरा है सदा के लिए | प्रशंसा पत्र)

नायाब हो तुम, हो सबसे जुदा
आने से तुम्हारे जल उठे हैं राहों में हज़ारों दिए
हमने जलाई थी लौ जो कभी बुझने ना दी
क्यूँकि हीरा तो होता ही है सदा के लिए

दुनिया में आने का था तुम्हारा एक मक़सद
हर बात तुम्हारी अनोखी और अन्दाज़ अविरल था
रौनक़ें ही रौनक़ें थी और माहौल भी था ख़ुशनुमा
और आने से तुम्हारे जहाँ मेरा जैसे मुक़म्मल था

बदलता रहा वक्त मगर तुम नहीं बदले
वक्त के साथ रिश्तों के मायने भी बदलते रहे
छोड़ दिया साथ जब अपनों ने हमारा
मौसम की मार से हम बस संभलते रहे

तो क्या नहीं दिया जन्म कोख से मैंने तुम्हें अपनी
खून के रिश्तों से बढ़ कर तुमने साथ हर पल दिया
थी दिशाहीन जिंदगानी मेरी और आकर
मेरे जीवन का उद्देश्य तुमने कुछ बदल सा दिया

रब से है गुज़ारिश कि हर जनम में नाम तुम्हारा
बस मेरे हाथों की लकीरों में लिख दे

हर जनम में मेरे हाथों की लकीरों में लिख दें नाम तुम्हारा
रब से मेरी बस अब है इतनी सी गुज़ारिश
तुझे माँग कर मैंने पा लिया जहां सारा
लगता है जैसे पूरी हो गई मेरी हर ख्वाहिश

उम्र की ढलान में जब कभी ठोकर मैंने खाई
पकड़ कर हाथ तुमने मुझे दिया है सहारा
खड़े रहे राहों में मेरी तुम नज़रें बिछा कर
मेरी परवरिश का क़र्ज़ देखो तुमने है कैसे उतारा

निशा टंडन

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