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भार्गवी रविन्द्र। (विधा : कविता) (हीरा है सदा के लिए | प्रशंसा पत्र)

दौलत की कसौटी पर यहाँ हर रिश्ता तौला जाता है
सबकी बोली लगाई जाती है ,सबका मोल आँका जाता है
मगर नही बन सका सका कोई हीरे सा अनमोल !

हीरे को तराशने वाली पारखी नज़र कहाँ
मन के अंधकार को मिटा सके ऐसी निष्कलंक जोत कहाँ
कोयले की खान में छुपा ईश्वर प्रदत्त हीरा है अप्रतिम!

सच्ची दोस्ती है हीरा ,माता पिता का स्नेह है हीरा
ईश्वर के प्रति आस्था है हीरा ,निज कर्म में निष्ठा है हीरा
अपने हीरे को खोजो , अपने हीरे को पहचानो
हर प्रलोभन से बढ़कर हो चाह है ऐसे हीरे की
रिश्तों में हीरे की पहचान ….है पहचान हीरे की ।

ऐसे हीरे की चमक हो जन जीवन में
जिस पर न लगा सके कोई बोली
पाकर इस धन को फिर न रहे कोई कमी जीवन में ।

हीरा है महज़ काँच का टुकड़ा ,जब तक उसकी पहचान न होगी
ईश्वर के मुकुट में शोभित काँच का टुकड़ा भी हीरा है
मानवता के ख़ून से रंगे सिंहासन पर
चमकता हीरा महज़ काँच का टुकड़ा है।

हीरे की चाह है तो हीरे सा गुण पाओ,
खुद को पहचानों, खुद को तराशो
युग युगांतर से है देदीप्यमान हीरा
कल था आज है कल भी रहेगा हीरा
क्योंकि,हीरा है सदा के लिए !
मौलिक सर्वाधिकार सुरक्षित(C)भार्गवी रविन्द्र

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