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निशा टंडन। (विधा : उद्धरण) (कागज़ की कश्ती | सम्मान पत्र)
जीवन काग़ज़ की कश्ती सा है, नश्वर, कभी बीच मझधार डूब जाता है तो कभी अपना साहिल पा लेता है।

जीवन काग़ज़ की कश्ती सा है, नश्वर, कभी बीच मझधार डूब जाता है तो कभी अपना साहिल पा लेता है।

मासूमियत भरा था वो बचपन हमारा खेल खिलौनों का नहीं था हमको सहारा बस आसमान ऊपर और नीचे धरा थी और फ़िक्र नाम की ना
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