
नीना राजपाल (अँधेरा प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र )
जब ज़िन्दगी मै तनहाई आती है .. ज़िन्दगी सूनी हो जाती है .. दिल जाने कंहा खो जाता है .. मन ही मन घबराता है

जब ज़िन्दगी मै तनहाई आती है .. ज़िन्दगी सूनी हो जाती है .. दिल जाने कंहा खो जाता है .. मन ही मन घबराता है

फिरता हु मै धरती पर फिर एक बार कटपुतली हू मै टूटी मेरी डोर बार बार ठिठूरती हड्डीया धुंधलाती नजर गलत सही गलत सही मूडती

यह अंधेरा काला स्याह इंतजार किसी के लिए, तो कहीं डर का आगाज कहीं सुबह के पहले की उदासी, तो कहीं सूने मकान में रोज

अंधेरा सघन, घनघोर, मन में उथल-पुथल, पुरज़ोर , बाहर शांत, भीतर शोर, जाने अब कब होगी भोर? हम अपने अंधकार से हारे हैं, फिर भी

कुछ छोड़ आया हूं, अंधेरो मै, बीती रातों और सवेरो मै उन तपती दोपहरों मै खाली रह बसेरों मै कुछ छोड़ आया हूं अंधेरो मै

उसकी दुनिया तो यूँ भी अंधेरी थी बचपन में ही आँखों की एक बड़ी बीमारी ने उसकी आँखें छीन ली थीं। ससुराल पहले से ही

मेरे प्रिय आत्मन , तमसो मा ज्योतिर्गमय ~ये प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा की गयी और दी गयी प्रार्थना है ! प्रार्थना का उच्चतम रूप

एक कोने में दुबकी हुई वह उन दोनों हैवानों को देख रही थी जो शराब की बोतले खाली किए जा रहे थे और वह तीन-चार

अंधेरे को मिटाने को एक चाँद तू भी जला ले बुझ गए चरागो में तू आज एक सूरज उगा ले अंधेरे के बोझ से क्यूँ

अंधेरा मिटता नहीं मिटाना पडता है बुझे चिरांग को फिर से जलाना पडता है दिया तले होता है अंधेरा पर हर रात के बाद होता
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