
अनामिका जोशी। (विधा : कविता) (दर्द की दास्तान | प्रशंसा पत्र)
मां तेरी झोली में आई नन्ही गुड़िया प्यारी सबकी आंखों का तारा और बनी थी राजदुलारी नन्हे कदमों से घर के हर कोने को छनकाती

मां तेरी झोली में आई नन्ही गुड़िया प्यारी सबकी आंखों का तारा और बनी थी राजदुलारी नन्हे कदमों से घर के हर कोने को छनकाती

जब भी रेप की कोई घटना होती है तो ये ख्याल मन में आते हैं जो मैंने तब कलमबद्ध किये थे जब एक आश्रय में

ये दर्द की दास्तान है हर शख्स परेशान है भीड़ से रौंदा गया वह पुलिस कर्मी ज़ख्मी है लहुलुहान है घर से दूर है बेबस

न गम से बाकीफ होते न दर्द से नाता होता एक पथ्थर दिल पर गर .. न इस दिल का आना होता सर्वाधिकार सुरक्षित बाॅबि

एक नदिया है मजबूरी की जो कल कल बहती रहती है ना रूकती है न थमती है अश्रु की धारा है निरंतर बहती है चाहे

डॉक्टर माँ की भागती हुई ज़िंदगी जब लॉक्डाउन में थोड़ा थमी , तो एक दिन यूँ ही ये ख़याल आया और दर्द का ये एहसास

“दर्द के बिना ज़िंदगी कहाँ पूरी है??? दर्दे- दास्ताँ बिना यह अधूरी है “ @ रीता बधवार

यूँ जमाने को कभी दिखता नहीं , वो छुपा सा आइना दिखता नहीं । रात दिन ये सोचता होगा कहीं , दर्द ये मेरा कभी

दर्द के कथ्य द्वन्द जड़े लपटें दहके आह ।

The day I was born, The nurse greeted my father with a smile, ” Congratulations sir, you are blessed with two pretty girls!”, The girls
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