एक नदिया है मजबूरी की
जो कल कल बहती रहती है
ना रूकती है न थमती है
अश्रु की धारा है निरंतर बहती है
चाहे राहें दूभर हो
आगे बढ़ना सिखाती है
इस पार है हम उस पार हो तुम
कैसे चल सकते हैं संग संग ?
एक बार मिले जो हम और तुम
सदा के लिए एक हो गए हम
अब कैसे समझाएं दिल को ?
अब कैसे मनाए मन को ?
न नैया है न खिवैया
नदी की गहराई भी कम नहीं
हमारी मजबूरियां भी नदी से कम नहीं
ऑखों से बादल बन उतरता है दर्द हमारा
न दिखता है न चुभता है
सिर्फ एहसास बनकर रहता है
भिन्न राहें हमारी, भिन्न मंजिलें
भिन्न संगी साथी, भिन्न महफिले
पर आत्माएं हमारे तुम्हारे सिवा
किसी से ना मिले
एक खलिश मन में लेकर चलते हैं
जिसे दिल में सजाकर रखते हैं
कहीं तो नदी नहर बनेगी
कहीं तो जाकर रेखा में परिवर्तित होगी
अतीत ना सही वर्तमान ना सही भविष्य ना सही
जिंदगी की शाम ढलने पर
शायद किसी पल में मुलाकात हो जाए
जिंदगी सफल हो जाए
दर्द अपने उरूज पर
अपनी दास्तान बयां कर जाए