
Paper Boat
निशा टंडन। (विधा : कविता) (कागज़ की कश्ती | सम्मान पत्र)
मासूमियत भरा था वो बचपन हमारा खेल खिलौनों का नहीं था हमको सहारा बस आसमान ऊपर और नीचे धरा थी और फ़िक्र नाम की ना

मासूमियत भरा था वो बचपन हमारा खेल खिलौनों का नहीं था हमको सहारा बस आसमान ऊपर और नीचे धरा थी और फ़िक्र नाम की ना

पति एवं बच्चों की अति व्यस्तता ने उसे आभासी जगत से जोड़ा। धीरे धीरे कई मित्र जुड़ते गए और वह इस दुनिया में रम गयी।

ना जाने दौर ये कैसा आया है अपनों से ही मिलने को तरसता है दिल फ़िज़ा में बिखरी हैं तनहाइयाँ और हालात भी हैं थोड़े

आभासी मित्र ——————— दिल के बहुत करीब हो मित्र, लेकिन कभी हम मिले नहीं । पहचानता हूं तुम्हें फोटो में, लेकिन कभी सामने दिखे नहीं
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