
विनीता सावजी (अँधेरा प्रतियोगिता | सम्मान पत्र )
अंधेरा मिटता नहीं मिटाना पडता है बुझे चिरांग को फिर से जलाना पडता है दिया तले होता है अंधेरा पर हर रात के बाद होता

अंधेरा मिटता नहीं मिटाना पडता है बुझे चिरांग को फिर से जलाना पडता है दिया तले होता है अंधेरा पर हर रात के बाद होता

अंधेरा अंधेरा अंधेरा… सुनने में सिर्फ शब्द हैं अन्तर्मन की दहलीज को पार करके जज्बातों को झकझोर देता हैं इसके आगमन का क्रन्दन… वो निकली

अंधेरा जब पलता है, आंख जब छलता है, बेचैनी जब पलती है, रुह रूक रूक कर जब मचलती है। दिल दुआ करता है, दिमाग आंहे

स्याह काली रात, घनघोर अंधेरा साथ राह ना सूझे, बाट ना बुझे उम्मीद की कोई थाह ना फूटे अपना, पराया, माई – बाप जब कहीं

उलझनों का सफर चलता जा रहा है , “आरी “का असर बढ़ता जा रहा है , जब गम खुशियों पर भारी पड़ जाए उस समय

इस घनघोर काली रात में रोशनी तो फैला दो ना … मुझे ड़र लगता है अंधेरे से एक दिया तो जला दो ना ….. मेरे

अंधेरे मुझे देखने अब लगे है अंधेरे मुझे घूरने अब लगे है अंधेरे मुझे सोचने अब लगे है अंधेरे मुझे अब डराने लगे है ,

सवेरा था मगर हर तरफ अँधियारा दीपक की लौ से जगमगा उठा जग सारा तिनके ने सीने को भेदा आग लगा दी चिंगारी ने आसमान

अपने अालेख का आरंभ मैं रामचरितमानस के इस सुंदर दोहे से करना चाहती हूँ….. “बाँध्यो जलनिधि नीरनिधि जलधि सिंधु वारीस, सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि

सागर किनारे बैठी मैं सोच रही ये जीवन क्या है!!!? गहरा सागर ही तो है, इसकी अथाह अनंत गहराई की थाह कौन लगा पाया है?
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