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अनु साहनी ( समय प्रतियोगिता | युगान्तकारी रचना हेतू प्रशंसा पत्र )

“समय”, तो गुज़रता है , गुज़रता ही चला जाएगा , अपनी ही रफ़्तार से, निरंतर यह बढ़ता जाएगा। “समय” की दहलीज पर ,ठहरा हुआ है

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डॉ शैलबाला दाश ( समय प्रतियोगिता | युगान्तकारी रचना हेतू प्रशंसा पत्र )

समय समय पर समय को सब अपना बना लेते है। अपना बताते हैं, अपना बताने से नहीं एतरातें हैं। सच में क्या समय अपना है!

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The Burning Planet

डॉ शैलबाला दाश ( जलती वसुंधरा प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र )

जलता है तन,जलती है वदन। चिंगारी है घृणा की,सुलगता है हर अंतर्मन। जलते हैं सूर्य,तारें, गर्दिश के अनगिनत नयन। जलती है बसुंधरा,ज़हर फ़ैलाता है अशुद्ध

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The Burning Planet

पूनम संधू ( जलती वसुंधरा प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र )

हे भगवान ! कैसा ये रंगमंच बिछाया है? सूर्य आज विडम्बना बनकर छाया है। ताकत, ऊष्मा, रोशनी, ऊर्जा देने वाला, वनमण्डल पर प्रकोप सा नज़र

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The Burning Planet

रीता बधवार ( जलती वसुंधरा प्रतियोगिता | सम्मान पत्र आलेख )

‘जलती वसुंधरा’ के इस भयावह दृश्य को देखकर अनायास ही’घर फूँक तमाशा देखने’ की याद आ जाती है आज चारों अोर हाहाकार मचा हुआ है।सभी

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The Burning Planet

ललिता वैतीश्वरन ( जलती वसुंधरा प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र )

क्या सोचा था तुमने जब काट वृक्ष इतराये थे जड़ को निकाल फेंक आये और पथरीली इमारत बनाये थे शहरीकरण के अहंकार से हजारों जंगल

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