
आरती मित्तल (2)( समय प्रतियोगिता | युगान्तकारी रचना हेतू प्रशंसा पत्र )
सुना था वक़्त होता है मरहम भर देता वो सारे ज़ख्म कुरेद कर देखा जो इक ज़ख़्मी मन घाव हरा था अन्तर्मन वक़्त ने जहां

सुना था वक़्त होता है मरहम भर देता वो सारे ज़ख्म कुरेद कर देखा जो इक ज़ख़्मी मन घाव हरा था अन्तर्मन वक़्त ने जहां

कौन जी सका वक़्त के मुताबिक ये जहान हसरतें कब सबकी पूरी हुई यहां वक़्त ने बदली सबकी दिशा वक़्त के आगे बेबस हुआ हर

मैंने .. हर रोज .. जमाने को .. रंग बदलते देखा है …. उम्र के साथ .. जिंदगी को .. ढंग बदलते देखा है ..

‘समय’है सर्व शक्तिमान, नहीं है विश्व में कोई इतना बलवान वक़्त है दिखाता सबको आईना, जिसमें झलकता रूप उसका शुद्ध सोना, वक़्त की ताक़त को

आज भी है कल भी होगा ‘समय’ है, वो प्रतिपल में होगा धरती क्या आकाश क्या वो तो जल और थल में भी होगा ना

आज फिर… सावन के वक़्त ने भादो से एसा मुँह फेरा कि पूरा ही घूम गया . घूमा ही नहीं एक जोर की छलांग भी

इस ब्रह्मांड में सब कुछ समय के घेरे में है .. सब कुछ समय के अधीन है ! सबसे महान है .. समय की सत्ता

सुधा जी! आज एक नए वृद्ध जोड़े का नामांकन हुआ है ,आप ही के शहर से हैं। ठीक है! तुम पुस्तिका में औपचारिकताएं पूर्ण करो,

रात सरकता शिशु रवि और, दिन में तपता भास्कर सांझ चमकते तारे हैं और रात रानी मेहताब है बस यहां समय का राज है मर्यादा

मैं आज से कल की स्मृतियाँ पिरो कर जोड़ता हूँ मैं समय हूँ ….मैं दिशायें मोड़ता हूँ चलता जाता हूँ अविरत , न रुकता हूँ
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