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अमित खरे। (विधा : कविता) (धोखा | प्रशंसा पत्र)

कलियुग में जो दिखता है,
बड़े लाभ का मौका।
देख भाल कर डग रखना ,
वहीं छुपा है धोखा ।

फितरत ये इन्सानी है,
हरदम लोभ गुलामी,
धोखेबाज़ो को होती इस,
अवगुण से आसानी,
ढीली गेंदों पर लगता है ,
आसानी से चौका।

कृतज्ञता का धोखा देकर,
वचन लिये कैकई ने।
लांघी धोखे में आकर ,
लक्ष्मण रेखा सिय ने।
रावण की मृत्यु के पीछे
अहंकार का धोखा ।

धृतक्रीड़ा का आयोजन,
था शकुनि का धोखा,
धोखा देकर अभिमन्यु को,
चक्रव्यूह में झोंका,
मूल में महाभारत के ,
दुर्योधन का धोखा।

द्वारा -अमित खरे

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