Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content
Post Type Selectors

शिप्रा अभ्यंकर। (विधा : कविता) (धोखा | प्रशंसा पत्र)

.*तेरी इंसानियत का हश्र*

 

तेरी रूह को नेस्तनाबूत कर के कई बार खंजर घोपे जाएंगे।

दुश्मनों से क्या खौफ तुझे
ये तेरे अपने है तुझे जीते जी दफना के आएंगे।

तू सिर्फ , तू सिर्फ इक तेरी कमजोरी तो बता उन्हें।
उसी कमजोरी को हथियार बना कर , एक दिन वो तेरी जान लेने आएंगे।

जमाने का दस्तूर है ये…
जिस दिन तू सबसे ज्यादा टूटा हुआ होगा , उसी दिन तेरी अस्मत को तार तार कर देने आएंगे।

तेरी रूह को नेस्तनाबूत कर के कई बार खंजर घोपे जाएंगे।

दुश्मनों से क्या खौफ तुझे
ये तेरे अपने है तुझे जीते जी दफना के आएंगे।

~शिप्रा अभ्यंकर~

 

One Comment on “शिप्रा अभ्यंकर। (विधा : कविता) (धोखा | प्रशंसा पत्र)

Leave a Comment