अधूरेपन में भी मुकम्मल है
हाँ, रंग अभी कुछ मद्धिम है
कुछ खुशबू भी अभी कम है
वक़्त आने पर खिल जाएंगी
ये कलियाँ फुल बन जाएंगी।
जी ले ने दो इन्हें बेपरवाह अभी
मुरझाने का इन्हें अब पैगाम ना दो।
खिल के कहाँ टिक पाएँगी ड़ालियों पर
कुछ गुलदस्तों की शान बनेगी
कुछ सजावट का सामान बनेगी
कुछ बालों में सजेंगी
कुछ गले का हार बनेगी
कुछ दिल की बात कहेंगी
कुछ सामान ए व्यापार बनेगी
कुछ इत्र की शीशी में भरेंगी
कुछ सड़कों पर बेजान मिलेंगी
कुछ खुशियों में शामिल होंगी
कुछ दुखों में शुमार मिलेंगी ।
पर जहाँ भी होंगी, मेहकेंगी मेहकाएँगी
बिखेर के रंग, रौनक दुनिया की बढ़ाएँगी।
उम्मीदें है नज़ाकत में लिपटी खिलती कलियाँ
अधुरेपन में भी पुरी है खिलती कलियाँ।
हमीदा
One Comment on “हमीदा। (विधा : कविता) (खिलती कलियाँ | सम्मान पत्र)”
Beautiful