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शैलबाला दाश (सागर किनारे प्रतियोगिता | सहभागिता प्रमाण पत्र )

सागर को क्या पता,किनारे की दर्द!
टूटते हुए लहरों के कद, सरहद!
कितना दर्द दफन हुए हैं किनारे!
टुट कर लहरें जो बिखर जाते सारे।
कितने भी लौट कर चले जाते हैं वेचारे!
कितने पैर के निशान अपने आप मिट गये,
सागर की पानी से ऐसे धूल गयें!
जैसे की किनारे तक कभी भी न आयें।
कितने अपने औकात को देखते ही पिछे हट गये।
सागर से पुछना था, गहराई है कितना।
किनारा वेचारा जाने क्या उतना!
हम अब खड़े है सागर की किनारे।
गहराई की अंदाज कैसे कौन करें।
जीवन की नैया को कैसे सागर में धकेलें!
अपनी जीवन को जीना है हैं अकेले।
क्या तिलिस्म राज छुपा है गहराई के अंदर।
किनारे को क्या पता,कैसे है यह समुंदर।
बिन डुबकियां अगर हाथ आये मोती,
सागर की किनारे मानो क्या क्या सपनें बिकतीं।
धुल कर बार-बार यह न थकतीं।
सागर किनारे मानो सपने बिकतीं।

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