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मेहनत

बिन मेहनत बिन लगन के
चांद को छूने के
ख्वाब आ गए हैं,
इस नए जमाने में
बड़ों को रुसवा करने के
नए रिवाज आ गए हैं।
पद हैं बड़े
तनख्वाहें है ऊंची,
रिश्तों को छोटा करने के
सब सामान आ गए हैं
जीते थे दूसरों के लिये
मेरे देश के बाशिंदे
पर ,
अब तो बस
हुकूमत करने के
जज्बात आ गए हैं ।

अवनीश

2 Comments on “मेहनत

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