Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content
Post Type Selectors

मन की आवाज़

वर्षों से बहुत कुछ दबा छुपा इस मन में
आने को आतुर बाहर इस जीवन में
उसको चुपचाप यूँ ही सुप्त पड़ा रहने दो
मन का आवेग बाँध थोड़ा तुम
स्नेह-धारा अविरल बहने दो

खरे सोने सा तपा मेरा मन
आकुल है प्रतिपल कुछ-२ कहने को
नि:श्शाँत पड़ा रहने दो उसको
जीवन-धारा निर्झर निर्भय बहने दो

पूरी शक्ति पूरी ताक़त से तुम चलते ही रहना
जीवन में हरदम आगे ही आगे बढ़ते रहना
यही मूल मंत्र है जीवन का
नहीं अर्थ है कुछ भी खोने या पाने का

@reetatandonbadhwar

मन रे तू काहे न धीर धरे ा

12 Comments on “मन की आवाज़

Leave a Comment