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भूरचन्द जयपाल (कविता) (सागर किनारे प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र)

सागर किनारे खड़ी इक नदी
सदी से इंतज़ार कर रही है
मिलन हो ना पाया
सागर से अब तक
मैं तड़पूंगी कब तक
अब सागर किनारे
उठती है लहरे हिय-सागर में
अगन दिल जलाये बैठा है कब से
मैं डरती ऐसे कहीं ये दिलजला
मेरा अब दिल ना जला दे
झुलस गये हैं पेड़ो के पत्ते
तपस-अगन सागर की पाकर
डर लगता सागर-लहरों से अब
बादल-बन जो तूफ़ान मचाती
प्यार हिये लिये प्रिये अब
मैं इंतजार करती सागर तीरे
तरु-पात भये है पियरे वैसे
मैं भी पीरी ना पड़ जाऊं
सागर-हिय कब शीतल हो
मैं मिल जाऊं प्रिय-हिय
मैं इंतजार करूं मिलन प्रिय का
खड़ी अब सागर किनारे ।।

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