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अश्विनी राय ‘अरूण’ (सागर किनारे प्रतियोगिता | सहभागिता प्रमाण पत्र )

क्या मैं हूँ क्या तुम हो और
क्या ये सागर का किनारा है
नदियां और सागर की भांति
जब तक अधूरा प्यार हमारा है

पास होकर भी बड़ी दूर हो तुम
फिर तो फीका हर नज़ारा है
फिर क्या मैं क्या तू
और क्या ये सागर का किनारा है

सागर में उठती मौजों का
सहारा तो किनारा है
तनमन में उठती लहरों का
तेरे बिन कौन हमारा है

अकेले थे जिए जा रहे थे
अब तो हर शाम तन्हाई ने मारा है
तेरे बिन अब क्या मैं हूँ
और क्या ये सागर का किनारा है

प्यार क्या है क्या जानू मैं
तू ही मेरे जीवन की बहारा है
नदिया की भांति तू आके मिल
मेरा जीवन एक शरारा है

क्या मैं हूँ क्या तू है
क्या ये सागर का किनारा है
जल में जल की भांति
लगजा गले दिल ने ये पुकारा है

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