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“अवाम का आत्मकथ्य”

हम चाहने वाले पशु हैं
हम जो होता है
उसे ही चाहते है
बाद में उसके होने का शोक मनाते हैं
बाद में जो नहीं होता
असल में हम कहते है हम उसे चाहते हैं
असल में हम जानते ही नहीं
कि हम क्या चाहते हैं
हम चाहते ही नहीं है चाहना
नही आता हमे चाहना
चाह कर भी हम क्या चाह पाएंगे
हमारे चाहने से होता क्या है
कौन चाहता है हमे
हम किसे चाहते हैं
हमारा चाहना कितना अर्थपूर्ण है
हम चाहते रहें होता क्या है
होने दो हम ऐसा कहाँ चाहते थे
हम ऐसा चाहते हैं
हम वैसा चाहते हैं
हमे चाहने दो
हम चाहना चाहते हैं
चाहने दो हमे
हम चाहेंगे
हमे चाहना है
चाहने में सबकुछ है
चाहते हम कुछ और हैं
होता कुछ और है
चाहने के ठीक विपरीत
चाहते रहो
चाहने से कुछ नही होगा
हम चाहते आये हैं वर्षो से
सिर्फ चाहते आये हैं
हमारा चाहना सिर्फ चाहने के लिए है
हम चाहने के अलावा कुछ नहीं चाहते
हम चाहने वाले जानवर हैं
हमे चाहने दो
हम चाहेंगे तभी तो कुछ होगा
न चाहे तो तो कोई
कुछ नहीं चाहेगा
हम सिर्फ चाहने के लिए पैदा हुए हैं
पैदा हुए सिर्फ चाहने को
ये भी चाहते हैं हम
वो भी चाहते हैं
सब चाहते हैं हम
सबको चाहते हैं
सिर्फ चाहते हैं हम
चाहने वाले जानवर है हम
हमे चहाते रहो….

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