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अंजली झा (कविता) (सागर किनारे प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र)

सागर किनारे वो लहरों की फुफकार
वो लहरों की गर्जन
करती है रेतों को तर्पण
वो सागर की गहराई
वो आसमान की ऊंचाई
उस बीच में है एक नौका आई
सागर की लहर जैसे किनारे पर मिलने को तरसता है
वैसे ही नाव लेकर केवट किनारे तक जाने को बढ़ता है
लहरों से भी भिड़कर नौका पार होती है
अथाह सागर में भी रहकर कभी सीप बाहर होती है
कभी चट्टानों से टकराती है
तो कभी हवा का झोंका खाती है
फिर भी कभी हार नहीं मानती
सागर के लहरों से पुछो जिंदगी क्या होती है
दो छोर को मिलाने का निरंतर प्रयास करती है
फिर भी वह कभी थकती नहीं है
सूरज के प्रचंड तेज को कभी सहती है
तो कभी हिम जैसे ठंड में भी अडिग रह जाती है
सागर के किनारे जाकर देखो
कितने कीमती वस्तु सहेज कर रखती है
सागर के लहरों से सिखों
निरंतर प्रयास करके आगे बढ़ते जाती है।

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