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हमीदा हकीम। (विधा : कविता) ( मन के पटाखे | सम्मान पत्र)

आँगन में रंगोली, मुंडेर पे जलते दिये जगमगा रहे थे
अमावस की रात में, उजालों की महफ़िल सजा रहे थे
सन्नाटों को पटाखों ने बिचका दिया
वो भी चुपचाप  फुलझडियाँ जला रहे थे ।
पड़ोस से आई मिठाई ने मिठास भर दी
वरना कुछ दिनों से कड़वे बाण चला रहे थे ।
पिछले दिनों सफाई में दिल भी ज़रा साफ कर लिया
दीयों से जगमग नैन उसके यही बता रहे थे ।
अंदर के रावण को रॉकेट पर बैठा फुर कर दिया
तब कहीं  जाकर चैन की बंसी बजा रहे थे।
चक्री पे सवार समय घुमाता ही रहा निरंतर
एक चक्री बंद भगवन तो दूजी चला रहे थे ।
कभी गुस्से के बम फटे, कभी खुशियों के अनार जले
करम की आतिशबाज़ी खुद को सिखा रहे थे।
आकाश में जा फटे पटाखे रंग बखेर के गुम हो गए
उजालों को भरने झोली में, झोली फैला रहे थे।
न आसपास देखा, न दिल टटोला न आँखें बाची
खाली झोली देख अपनी आँसू बहा रहे थे।
आँगन में रंगोली, मुंडेर पे जलते दिये जगमगा रहे थे ।
                                      -हमीदा हकीम

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