मां तुम झूठ बोलती थीं,
कि कोई फर्क नहीं होता,
बेटे और बेटी में।
सच, हम दोनों में तुमने,
कभी फर्क किया भी नहीं मां,
तेरी आंख के तारे थे हम दोनों।
लेकिन आज जब तुमने कहा,
‘मैं बेटी के दरवाज़े पर मरना नहीं चाहती’ ,
तुमने हम दोनों में फर्क कर दिया।
मैं तुमसे बहस नहीं कर सकती,
तुम इस हालत में नहीं हो,
कि मैं अपनी नाराजगी जाहिर करूं।
पीठ कर लेती हूं तुम्हारी ओर,
कि कहीं आंखों की सीमा तोड़,
कोई गुस्ताख मोती छलक न जाए।
भीगी पलकें, आहत मन और
मेरा घायल अंतर्मन,
आज सब कुछ छुपा लिया है तुमसे।