मैं संगीता एक छोटे से शहर में रहती हुं।हमारे विस्तार में अलग अलग कोम के सभी लोग रहते हैं।अलग अलग भाषा अलग अलग संस्कृति होने के बावजूद भी सभी लोग एक दूसरे से बड़े प्यार से रहते हैं।यहां दीवाली हो या ईद,क्रिसमस हो या चेटीचांद पूरे सम्मान के साथ मनाया जाता हैं।हमारे घर की गली में एक बहुत ही अच्छे इंसान रहते थे जिनका नाम अब्दुल भाई था।वोह अकेले ही थे उनका परिवार विभाजन के वक्त उनसे छूट गया था अब वोह भारत को ही अपना देशसमझकर रहते थे।हमारे परिवार के साथ उनका प्यार का रिश्ता हो गया था,हम सब को भी काफी लगाव हो गया था उनसे।एक दिन वोह अगर हमसे मिलने नहीं आते तो बाबूजी तुरंत उनकी खबर निकालने उनके घर पहुंच जाते।हमारे महोले में जब गणपति का उत्सव होता तो सब से ज़्यादा सेवा का काम भी उन्हीं के हाथों से होता।एक बार मेरी मां बहुत बीमार पड़ गई,बाबूजी किसी काम कि वजह से बाहर गए हुए थे घर में कोई पुरुष नहीं था रात बहुत हो चुकी थी,मां का बुखार उतारने के नाम ही नहीं ले रहा था मैं भागी भागी उनको बुलाने गई वोह तुरंत अपनी जान पर खेलकर भी डॉक्टर को ले आए मां तो अच्छी भी हो गई।जान पर खेलना शब्द मैंने इसी लिए इस्तेमाल किया है कि उस टाइम हमारे यहां कर्फ्यू लगा हुआ था। फिर भी उन्होंने यह नेक काम करने में देरी नहीं की।बाबूजी जब वापिस आए तो उनका शुक्रिया अदा करने उनके घर गए तो वोह काफी भाव विभोर हो गए कहने लागे “चाचा जी मैंने इस देश का नमक खाया है,यहां ही पला हूं और फिर रिश्ते भी तो कुछ मायने रखते हैं इस देश ने भी मुझे काफी कुछ दिया है और आपके परिवार ने भी काफी प्यार दिया है सो मैंने तो सिर्फ अपना नैतिक फ़र्ज़ निभाया है।वैसे यहां मुझे यह बताना बेहद जरूरी लग रहा है कि जब वोह इन परस्थितियों में डॉक्टर को लेने निकले थे तभी उन्हें पुलिस के डंडे भी खाने पड़े थे।सच में मुझे बहुत मान है ऐसे लोगों के लिए जो देश के लिए रिश्तों के लिए अपनी तकलीफों की परवाह नहीं करते।
🇾🇪।।जय हिन्द।।🇾🇪
– सुशीला गंगवानी