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सपना अरोरा। (विधा : कविता) (परिक्षा | सम्मान -पत्र)

परीक्षा थी सामने खड़ी,
दिल धक धक करता था,
समस्या लगी बड़ी
क्यूँकि सामने दिखता बस्ता था।

पुस्तकें थी अनेक, भरे हुए पेज, हाथ भी फड़कता था,
याद किया भी,भूल गया,
हर वक्त,ऐसा लगता था।

पर्चा जब हाथ आया,
सिर तो घूम गया,
बैठा जब लिखने,
प्रभु को याद किया।

लिखने को कलम उठाई प्रश्न का उत्तर भूल गया! फिर सोचा…
पूरा है करना, पर्चा है भरना, लिखता गया, लिखता गया ले कर ठंडी साँस, पर्चा मैंने पूरा किया!

समय ने करवट ली, कलम बनी लेखनी,
पुस्तक की भरमार,
ज्ञान का खुला भंडार।
घबराहट को किया क़ाबू
नियम हुए लागू
और फिर.. बढ़ता चला गया।

स्व-लिखित✍🏻
“सपना अरोरा”

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