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श्याम सुंदर शर्मा (विधा : कविता) (न्याय | प्रशंसा पत्र)

आदि काल से सृष्टि के कण कण में समाहित है,

 

एक अलिखित सहज प्राकृतिक न्याय,

 

जिसके अन्तर्गत संचालित होता हर एक अस्तित्व,

 

जिसका अस्तित्व सुनाई पड़ता है,

 

अंतर्मन में  विवेक की आवाज़ बनकर,

 

जो कचोटता है अंतरात्मा को अगर किया जाए उल्लंघन,

 

पर काम, क्रोध, इर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ और महत्वाकांक्षाओं के प्रभाव में बहरा होकर,

 

जब इंसान होता चला गया निरंकुश आतताई पशु जैसा,

 

तब उसकी पशुता पर अंकुश लगाने हेतु प्रबुद्ध जनों द्वारा,

 

स्थापित की गई मानव निर्मित न्याय और दंड व्यवस्था,

 

जो सदा संघर्षरत रहती है निष्पक्ष हो कर न्याय प्रदान करने में,

 

कभी कभी पेचीदा कानूनों और तारीखों की भूलभुलैया में बेबस, कसमसाता न्याय दम तोड़ता भी प्रतीत होता है ,

 

पर प्राकृतिक न्याय बिलकुल बेबस नहीं, 

 

बड़ा ही कांइया और ढीठ भी है,

 

उससे कोई हमेशा के लिए नहीं बचता!

 

वह सब कुछ सूद समेत वसूल लेता है!!

 

बस उसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती!!!

 

~श्याम सुंदर शर्मा

 

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