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श्याम सुंदर शर्मा ( समय प्रतियोगिता | युगान्तकारी रचना हेतू प्रशंसा पत्र )

उत्तुंग समय मीनार खड़ी,
सदियों से समय दर्शाती है।
महत्ता समय की जीवन में
जन जन को समझाती है।

भले ना देखा किसी ने इसे,
सब महिमा इसकी ही गाते!
सोते जागते इशारों पर इसके,
काम करते घर लौट आते!

जो घड़ी नचाती जग सारा,
जब वक्त उसका फिर जाता।
पड़ी सुस्त या की मनमानी,
उसे जग कबाड़ में पहुंचाता।

हर एक के हिस्से में तो,
समय समान ही आता।
कोई कर लेता सदुपयोग,
कोई व्यर्थ ही इसे गंवाता।

समय रहते मर्म समय का,
जो कोई नहीं समझ पाता।
सही समय निकल जाने पर,
पिछड़ने पर खूब पछताता।

सबक समय का समय रहते,
जब सीखने में चूक जाते,
तब अपनी असफलता को, मत्थे समय के ही मंढ जाते।

सदा सम्मान करो समय का,
गुरु जन सीख सदा दोहराते।
कर सीनाजोरी इससे सभी,
अंततः धूल में ही मिल जाते।

सही समझ से साथ चले जो,
कई करतब गज़ब कर जाते!
उपलब्धियों के बल पर खुद
शामिल इतिहास में हो जाते।

सच्ची सम्पत्ति समय ही है,
अब बिलकुल ना गंवाऊंगा।
अब जितना भी शेष बचा,
निर्धारित कार्य में लगाऊंगा।

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