अक्षय अर्थात जिसका कभी क्षय नही होता ।किसी भी प्रकार का दान या शुभ कर्मो से कमाया हुआ हमारा पुण्य कर्म फल हो ।सनातन धर्म के अनुसार वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया या आखातीज कहा जाता है ।यह स्वयं सिद्ध तिथि है अर्थात इस दिन किसी भी प्रकार का शुभ अशुभ का विचार नही किया जाता।
आज कथित हिन्दू धर्म के नाम पर हर जगह धर्म का पाखंड हो रहा है और हम मनुष्य सनातन धर्म से दूर होते जा रहे हैं ।भारतीय काल गणना के अनुसार वैशाख वर्ष का दूसरा माह है ।इस माह को बहुत ही पवित्र माना जाता है शायद इसीलिये यह देवताओं को भी बहुत प्रिय हैं ।भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि से युग की गणना होती हैं सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ था ।भगवान विष्णु ने इसी तिथि को नर नारायण, हयग्रीव, और परशुराम जी का अवतार भी इसी तिथि को हुआ था ।आपको बता दू कि महाभारत युद्ध इसी तिथि को समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी तिथि को हुआ था ।मदनरत्न के अनुसार–
अस्या’ तिथौ क्षयमुपर्ति हुतं न हत्तं ।
तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतिया ।।
उद्दिष्य दैवत पितृन्क्रियते मनुष्यै।
तत च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव ।।
इस तिथि को किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है ।वास्तव मे कर्म ही सनातन धर्म का मूल सिद्धांत है ।मनुष्य को परमार्थ करना चाहिए जिससे दूसरो को सुख पहुंचे ।हमारे कलुषित आचरण का ही परिणाम है कि गंगा और गंगा जैसी तमाम नदियों का अस्तित्व समाप्त हो गया है ।वन्यजीवों का अस्तित्व भी खतरे मे है
।आज हम दान को मात्र धन से जोडते टेलीविजन और सोशल मीडिया के तमाम धर्मगुरू कितने उपाय और टोटके मात्र धन कमाने के लिए बताते रहते हैं ।क्या इन्हें पता नही कि धरती ही नही होगी तो धन कहा से आयेगा ।वैशाख माह से वातावरण में गर्मी का प्रभाव बढने लगता है।इससे बचने के लिये छाता चाहिए, धूप मे पांव न जले इसलिए जूता चाहिए, प्यास बुझाने के लिए जल या शरबत चाहिए, पंखा चाहिए,इसलिए अक्षय तृतीया पर इन इन वस्तुओं के दान का महत्व है दिया गया दान एक दूसरे व्यक्ति की आवश्यकता पूरी करता है क्योंकि ईश्वर सबको स्वयं नही देता ,न ही सबको बराबर देता है ।वह एक को देता है और उसे ही दूसरे को देने की जिम्मेदारी भी सौप देता है ।किसी को आग देता है, किसी को पानी देता है ,किसी को एक हाथ देता है, किसी को दोनो हाथ देता है, किसी को खाली हाथ देता है ।सृष्टि की सबसे बड़ी आवश्यकता है रोटी इसीलिए सनातन धर्म मे अन्नदान को महादान कहा गया है।हालांकि दान के महत्व को सभी धर्मों ने स्वीकार किया है देने की भावना रखने वाले को ही ईश्वर देता है ।दान एक पवित्र भावना हैं और इस आचरण को पूर्ण करने वाली भावना भी अक्षय होनी चाहिये
स्वरचित
शाम्भवी,
प्रयागराज,