यह मोह मोह के धागे भी बड़े अज़ीब होते हैं..
जिससे उलझते हैं उससे ही बहुत आस लगा लेते हैं
चाहे ग़म हो या ख़ुशी उन्हें अपने इर्द गिर्द सर्वदा पाते हैं
उन्हें हम हमारा हमराज़ ,हमसफ़र
सब मान प्यार करते हैं
वह भी हमारे विश्वास को प्यार से सींच देते हैं
ना जाने कब इस सफ़र में एक दूसरे की आदतों में रम जाते हैं..
उनके बोलने से पहले , अक्सर हम कह जाते हैं।
एक साथी होने से ख़ुद को आनंदित पाते हैं
उसे संजोने की हर मुमकिन कोशिश कर जातें है
यहीं तो जादूगरी इस बुनाई में अपनो के बीच अपनो के लिए..
हम ताउम्र खुद को भूल उन्हें अपना अस्तित्व मान बैठते है।
रूपल मोहता
