Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content
Post Type Selectors

मुस्तफ़ा साबूवाला (UBI पर्यावरण दिवस प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र)

मेहकी हुई फिज़ाएं हुवा करती थी ,
चिड़िया भी दिल से केहकहा करती थी,
बारिश भी झूम के बरसा करती थी,
सागर से भी मौजे उठा करती थी ।

अब हवाओं मेे ज़ेहरीलापन छा रहा है,
छिड़या का भी घर छिना जा रहा है,
झीलो का बारिशों को तरसा जा रहा है,
सागर में भी प्रदूषण डाला जा रहा है ।

यह नेमतें खुदा की, क्या अधर्म कर दिया है,
खुद पर ही शायद यह सितम कर दिया है,
दुनिया के हाल ने, आंखों को नम कर दिया है,
जन्नत थी ये ज़मीन, जहानम कर दिया है ।

 

Leave a Comment