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मुक्ता टण्डन (UBI उस गली में प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र)

एक वक्त था
क्या कुछ नहीं था, उस गली में!!
शोखियां, अठखेलियां, नादानियां
जिंदगी कहकहे लगाती, फिज़ां रंगीन थी, और मौसम खुशगवार

किसी के दिल में दरार न थी

मुझे याद आती है उस गली में
नुक्कड़ वाली चाय की दुकान
जहां मनचलों का जमघट लगा रहता,
गली के छोर पर पान की दुकान
जहां घंटों बहस करते क्या बूढ़े क्या जवान,
वो लैंप शेड का पत्थर
जहां घंटों बैठकर मैं करता रहता
तुम्हारा इंतजार,तुम्हारी पाजेब की आहट पाते ही दिल धड़क उठता
सिहरन सी दौड़ जाती
वही गली जहां सांझ होते ही
लगता चाट पकौड़ी का ठेला
सब समय वहां रहता रेलम पेला,
इशारों ही इशारों में करते थे बत्तियां
लड़के और लड़कियां,
न जाने क्यूं अब उस गली में
धूल है ,गर्द है ,गुबार है
मौत की खामोशी सी छाई है
गुज़रे वक्त की परछाईं ही परछाईं है
चहुं ओर काली धुंध ही छाई है।

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