आज फिर वही अमावस की काली घनी रात बारह बजे
वीरान खंडहर से पड़े उस किले के भीतर,
अचानक जल उठी है लाइट
उभरी इक दर्दनाक चीख,
फिर विकराल सा अट्टहास,
हवा एकदम सिहर, सिमट ठहर सी गई,
दहल उठा मेरा दिल
क्या है वहां बुरा साया किसी का?
रहते हैं क्या वहां भूत-प्रेत?
भटक रहीं हैं क्या उस किले में अतृप्त आत्मा किसी की?
सोचती हूं, ऐसा क्या हुआ होगा? क्यों अट्टहास और रुदन करतीं हैं वहां की दीवारें?
क्या देखा होगा वहां की दरों दी्वारों ने?
क्यूं सहमी-सहमी सी है हवा?
भूत-प्रेत सच में है या महज़ कल्पना है?या फिर
विकृत सोच है डरे सहमे मन की
परछाईं है ये अट्टहास और रुदन
मानव के ही कुकर्मों की?
मानव में स्वयं भूत -प्रेत छुपा है?
आज तक मैं समझ न पाईं, गुत्थी सुलझा न पाईं उस भूत – बंगले की।
