घबरा मत मन
आज गर चहुं ओर दीख रहा अंधेरा ही अंधेरा है,
हाथ को हाथ न सूझ रहा
निराशा घर कर रही मन में,
उम्मीद की किरण न दिख रही
हताशा की बिजली कड़क रही जीवन में,
बेरोजगारी, शोषण की काली घटाएं उमड़ रहीं
चारों ओर मचा हाहाकार है।
हिम्मत न हार,
अंधेरे के उस पार रोशनी की जीर्ण
किरण भी दिख रही
सबकी चेतना बलवती हो रही
सोचा कभी?
रात के बाद भोर होती ही है
अमावस्या के बाद पूर्णिमा आती है
वो जो दूर छोटा सा दिया टिमटिमा रहा
वही मार्ग प्रशस्त करेगा
वही धैर्य बंधा रहा।