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भावना शर्मा। (विधा : लघुकथा ) (जीवन – आनंद | प्रशंसा पत्र )

‘ये क्या है माँ? ये दो रुपये का बलून, ये पाँच रुपये की लोकल आइसक्रीम कितनी चीप है ये।मैं नहीं खाता ये सब पता है ना आपको।’कहकर पैर पटकता यश वहां से चला गया।मीता बस ताकती रह गयी।मीता का बारह साल का बेटा यश बस ब्रांड्स के पीछे पागल है,उसके नजरिये से देखें तो इनमें ही दुनिया है।आडी,रायलएनफील्ड,नाईकी,रैबेन वगैरह वगैरह नाम रटता रहता है यश।मीता ने कई बार समझाया कि खुशियाँ भीतर से आती है बाहर से नहीं और चीजों से तो हरगिज नहीं। चीजें जरूरत पूरी करने के लिए होनी चाहिए दिखावा करने के लिए नहीं।पर उसे समझाना बहुत मुश्किल काम है।पर दिन हमेशा एक जैसे नहीं रहते,बारिश के बाद के उमस भरे दिनों मे मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया था और यश भी चपेट में आ गया।ड़ेंगू से हालत खराब, अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा।अस्पताल के वातावरण में जहां स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार महसूस करने लगता है ।यश तो बीमार ही था ,वह शारीरिक और मानसिक दोनों रुप से हताश महसूस कर रहा था।मीता हर तरह से उसे सम्भाल रही थी उसे खुश रखने की कोशिश कर रही थी।आखिर दस दिन बाद उसकी स्थिति में सुधार हुआ,उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गयी थी।यश और मीता अस्पताल से बाहर निकले कि यश खुशी से चीख पड़ा ‘माँ बलून’मीता ने आश्चर्य मिश्रित खुशी से उसे देखा और दो उसके लिए खरीद दिए ।यश ने मुस्कुरा कर कहा कि ‘मैं समझ गया माँ,खुशियाँ हमारा चयन है, हमारी खुशियाँ हम से है,चीजों से नहीं,थैंक्यू माँ’ कहकर यश मीता से लिपट गया और मीता भी आँसू लिए मुस्कुरा दी।

भावना शर्मा

स्वरचित

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