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प्रिया गुप्ता (विधा : कविता) (मेरा # दिल कहता है | प्रशंसा पत्र)

वक़्त बेवक़्त हम ऐसे दूर हुए..
जुदाई के मंज़र मज़बूत हो गए..
तेरी याद में हम रातो के पक्के
हमसफ़र बन गए..
दिल कहता है के दिल के ज़ख्म नासूर कर गए..
रूह तो ले गए थे ये जिस्म क्यों छोड़ गए,

थोड़े से आंसूं आँखों में रह गए..
कुछ टूटे दिल के टुकड़े सिमटने रहगये..
वो गुज़रे ज़माने हर सांस पे..
हमें काटों से चुभने लगे..
अब दिल कहता है न याद करूँ तुझे..
की बची उम्र भी न अज़ाब लगे,

तो क्या की इश्क़ के अफ़साने अधूरे रह गए..
तो क्या की इंतज़ार में परवाने भी जल गए..
अब जीने के लिए ऐसा कुछ इंतज़ाम हो जाए..
की तन्हाई और ख़ामोशी में ज़िन्दगी गुज़र जाए..
और दिल कहता है बस सांस लेने के लिए ज़रूरी..
मेरे लिए कुछ धड़कने ही छोड़ दे!
प्रिया गुप्ता

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