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डॉ शैलबाला दाश (अँधेरा प्रतियोगिता | सहभागिता प्रमाण पत्र )

अंधेरा जब पलता है,
आंख जब छलता है,
बेचैनी जब पलती है,
रुह रूक रूक कर जब मचलती है।
दिल दुआ करता है,
दिमाग आंहे भरता है।
तब हाथ बढ़ता है।
प्रार्थना पर आकर रूकता है।
आवाज़ निकलता है,
बेजान जान अन जाने में चीख उठता है।
“तमसो मां ज्योतिर्गमय, मृत्त्योर्मां अमृतं गमय”।
“तथास्तु ” के साथ समय वोल उठता है,” मा, भय”।
अंधेरा और मृत्यु हैं एक समान ।
न सुझता है कुछ,वली चढ़ जाती है, मन की हर एक अरमान।
अज्ञानता से युझने पर मजवूर हो उठता है मन।
ज्योति की खोज में अगर आग मिले,
अंधेरे से युझने से अगर खुद भी हम जलें,
हो जाये अगर जो होना है,
अंधेरा नहीं, उजाले के साथ हमें जीना है।
अगर ज्योति कहीं न मिलें,
खुद ज्योति बनकर हमें जल उठना है।
अंधेरे पर हमें न रुठना है।
क्षण में राख बनना मंजूर है हमें।
कुछ क्षण ही सही, उजाला दे जाएंगे तुम्हें।

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