धरा की ओट से बाहर झाँकता
एक नन्हा सा अंकुर
बेरहमी से कुचलता जाने वाला
एक रोङ रोलर
किसी ने सुनी नहीं
उस अंकुर की आह
बेरहम तरक्की की निर्मम चाह
रोंदती जाती हैं आस का हर अंकुर
जो अपने भविष्य मे छिपा कर रखता है एक वृक्ष जो .
फल दे फूल दे छाया दे
वृक्षोंको कांटते हैं
अंकुर को कुचलते है
आने वाली नस्लों का
प्राण वायु ही रोकते हो
संभलो रोको रूको
ये धरा अब रो पङी हैं
अंकुरो को पेड़ बनाने की घङी है
सृजन से ही बचे हर अंकुर अब
हरियाली के सेवा में लिन हो सब