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आराधना अग्रवाल। (विधा : कविता) (गुल्लक | प्रशंसा-पत्र)

मेरे दिल का गुल्लक अहसासों से लबालब भरा है, पर मेरे लब की मानिंद खामोश रहता है। इसमें कोई हलचल नहीं, रुपयों से गंभीर विचार भरे पड़े हैं, कोई खनखनाहट नहीं, खर्च कर दिए रिश्तों के खुदरे सिक्के मैंने। छोटे – बड़े मूल्य के, सावधानी से मोड़ कर, संजोए हैं इसमें महत्वपूर्ण जज्बात। वक्त किसी रिश्तेदार की तरह जाते समय थमा जाता है कुछ रुपये या सिक्क

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