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अनामिका जोशी । (विधा : लघुकथा) (तो क्या | प्रशंसा पत्र)

अरे!! समधीजी! यहआपक्याकहरहेहैं??
इस वक्त हम इतने पैसों का इंतजाम कहाँ से करेंगे? “फेरे तो पूरे हो जाने दीजिए।”
“नहीं !! बाकी फेरे एक लाख नकद आने के बाद ही होंगे!! “
पर आपकी बाकी मांगे भी तो हम पूरी कर चुके हैं।
हाँ, तो क्या ?
हम लड़के वाले हैं ,आपको यह सब करना ही चाहिए।
” लड़के वाले हैं तो क्या “??
अरे बेटी!! तुम यहाँ?? मंडप छोड़कर क्यों आई?
लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे!!
तो क्या पिताजी ! बहुत हो गया !
अरे !लड़की वाले हैं तो कुछ भी??
“मैं खुद यह रिश्ता नामंजूर करती हूँ।”
पर चार फेरे हो चुके हैं ,अनर्थ हो जाएगा बेटी!
कुछ नहीं होगा पिताजी !!
आप ऐसे लालची लोगों के आगे इतना क्यों झुक रहे हैं??
मुझे मंजूर नहीं यह सब।
पर बेटी ,,,, हम लड़की वाले,,,,,,,,
तो क्या,,,,,,,,,,
लड़की वाले हैं तो कुछ भी सहन करेंगे???
यह लोग शायद नहीं जानते गृहस्थी दोनों पहियों के बराबर चलने से आगे बढ़ती है ।
आपको आपका बेटा मुबारक।
पर बेटी,,,,,,,!!
पर वर कुछ नहीं,,,,,, कह दीजिए इन्हें,,,” बारात ले जाए”
,,,,,,,,,,,,,,,,,
आज अपनी बेटी की शादी पर अंशुमन के परिवार ने मात्र एक नारियल स्वीकार कर मानवता का परिचय दिया था।
सुधा को अपनी शादी याद आ गई थी ।उस दिन के फैसले पर वह आज बहुत खुश थी। रोहित से उसकी शादी हुई थी जो पेशे से डॉक्टर और समाजसेवी भी था।
उसने सुधा के इस फैसले की बहुत तारीफ की थी ।
उन दोनों की बेटी की शादी पर उसकी यादें ताजा हो गई। उसने अंशुमन से पूछा-” पर हम तो बेटी वाले हैं ना,,,,,,,,,,,,,,
अंशुमन ने कहा – हाँ, तो क्या,,,,,,,,,,
और सभी खिलखिला कर हंस पड़े।
(स्वरचित) अनामिका जोशी “आस्था

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