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हेमलता मिश्र “मानवी” (अँधेरा प्रतियोगिता | सम्मान पत्र )

उसकी दुनिया तो यूँ भी अंधेरी थी बचपन में ही आँखों की एक बड़ी बीमारी ने उसकी आँखें छीन ली थीं। ससुराल पहले से ही बहुत गरीब था। पति किसी पेट्रोल पंप पर काम करते-करते थक चुका था सो अमीर ससुराल के लालच में इस अंधी लड़की से शादी कर ली – – कोई लगाव नहीं कोई भावना नहीं बस एक आवश्यकता पूर्ति का ढकोसला।
और उसी ढकोसले की परिणिति हुई आज के इस मकाम पर जहाँ वह नाबीना लड़की द्रौपदी बनी खड़ी थी और उसके आसपास दुशासन और दुर्योधनों की भीड़ में उसका अपना चचेरा देवर उसे मजबूर कर रहा था प्रापर्टी के पेपर्स पर साईन करने के लिए अन्यथा भरी महफिल में उसे नग्न कर देने की धमकी दे रहा था पति अपनी पहचान छुपाकर चुपचाप खड़ा था थोड़ी दूर पर।
बेटी के सुहाग की सूरत और सीरत की बड़ी अच्छी तस्वीर मन में बैठाए – – इकलौती बिटिया की ओर से निश्चिंत सास ससुर तीरथ यात्रा पर जा चुके थे मगर दामाद के इस काले दिमाग की कोई तस्वीर नहीं थी मन में।
एकाएक फोन की घंटी बज उठी। साढे बारह बजे रात का वह अंधेरा गूंज उठा। वैश्णों देवी की घाटियों में पवित्र मंत्रोच्चार की आवाजों के साथ ससुर जी की विश्वास भरी पुकार ने तन मन प्राण हिला दिए। वे कह रह थे—बेटा बिटिया की बड़ी याद आ रही थी सो सोचा उससे बात कर लेते हैं, जरा बात करवाओगे क्या सुनैना से।
काटो तो खून नहीं क्या करे क्या ना करे।मगर अंधेरे की पुकार – – –
पति के फोन की रिंगटोन— सुनकर ही वह लड़की मानो दुर्गा बन गई। अंधियारा गूंज उठा उसकी दर्प भरी गर्जना से। वह कह रही थी – – “दुष्टो देखो मेरे रक्षक, मेरे स्वामी, मेरे पति आ गए हैं। वे तुम्हें अभी मजा चखाते हैं। दस्तखत चाहिए ना लो कर दिए – -कहते हुए उसने पूरे पेपर्स फाड़कर हवा में उछाल दिए।
उसका अटूट विश्वास, माता वैष्णो देवी की अकथ करनी, सास ससुर का अमूल्य करुण भरोसा – – – – बस धुल गया पति के मन का सारा कलुष। छँट गया अंधेरा – – जुड़ गए मन के तार जो विवाह की रस्मों के साथ नहीं जुड़ पाए थे वे आज जुड़ गए थे अब कभी ना टूटने के लिए। अपनी पत्नी की लाज बचाने का नाटकीय ढोंग ना करते हुए विराम ने सीधे सीधे अपनी गलती कबूल कर ली और पुलिस के पास बयान भी दर्ज करवा दिया मगर जो अंधेरे गुनाह से पहले ही छँट गए उस पर कौनसे जुर्म सिद्ध हो सकते हैं भला। उजालों की जीत हुई क्योंकि – – -अंधेरे की उजली पुकार ने सब ओर उजास कर दिया था।

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