मेरा दिल कहता है
क्यूं बन जाऊं फ़कीर
किसी पहले से खींची लकीर का?
क्यूं कैद करूं खुद को
पूर्व परिभाषित, पूर्व निर्धारित
सुरक्षित से सांचों में?
जुट जाऊं अन्वेषण में
ढूंढ लूं ऐसी दिशा
जो हो अनुकूल मेरे अस्तित्व के
जिस ओर बढ़ना हो ऐसे
जैसे दौड़ लगाना ढलान पर
ना कशमकश ना कोई अंतर्द्वंद्व
प्रतिद्वंद्वी बनूं केवल अपने आप का
सदैव जोश और उमंग से लबालब
बनाता चला जाऊं राह अलबेली
जिसका हर पड़ाव कतई कम ना हो
किसी भी लुभावनी सी मंज़िल से
बन मतवाला मुसाफ़िर
बढ़ाऊं हौसला हर हमसफ़र का
कभी मोहताज़ ना रहूं
किसी ललचाती मंज़िल का…
~श्याम सुंदर शर्मा