पहाड़ों पर जब दिन ढलता है
सूरज आके भी नहीं मिलता है
तब इन बर्फ़ीली शामों में हम
यादों का अलाव जला लेते हैं
और ताप लेते हैं उन दहकती यादों को
जो बुझ कर भी नहीं बुझतीं हैं
सुलगा देती हैं तन मन को
रगों में जमा खून पिघला देतीं हैं
एक बैचेनी,अनमनापन छोड़ देतीं हैं
काश इन बर्फीली शामों में
तुम संग होते
फिर नही जलाना पड़ता
यादों का अलाव
और बीत जाती ये बर्फीली शामें भी
जैसे बीत जाते हैं तुम बिन ये रात दिन
शहला जावेद