उन गलियों में आज फिर खड़ा हूँ
ठगा सा , उदास सा, सूनी आँखें लिए
जहाँ हुई थी हमारी मुहब्बत जवाँ
कितनी पेंगें ली थीं उस झूले पर
कितनी बार तुमको पीछे बिठा कर
अपनी उस दुपहिया गाड़ी को तेज़ी से चलाया था
कितनी बार उस चाट के ठेले पर
गोल गप्पों की लगायी थी शर्त
तीखी मिर्च से जलते मुंह को
सहलाया था गुड़ की डली से ….
दुपट्टे की ओट से जब तुम बाबूजी को आते देख लेती !
मुझे भाग जाने को कहकर खिलखिलाकार हँस पड़ती….
उस पेड़ पर एक दिल का चिन्ह अब भी नज़र आता है ..
जो हम दोनो ने एक साथ उस शाख पर कुरेदा था ..
कसमें थीं वादे थे …कभी न बिछड़ने के इरादे थे ..
और फिर आचानक उन जात पात के ठेकेदारों ने
मुझे जकड़ लिया था और ….
तुम्हे मुझसे दूर कहीं ले गये …
हमारे हृदय हुये थे तार तार
तुम उस पार और मैं इस पार
आज भी मगर हूँ केवल एक ज़िन्दा लाश
उस गली का आज ज़िक्र न हुआ होता काश !!!